Modern Life and Yoga

(आधुनिक जीवन एवं योग विद्या)

Pradip Kumar Soni*; Dr. Brijesh Kashyap**; Dr. Prashant Upadhyay*** 

*Ph.D. Researcher; **Assistant Professor, Department of Yoga,
Dev Sanskriti Vishwavidyalaya, Sankra, Kumhari, Durg (C.G.);

***Assistant Professor, Department of Education,
Maharishi University of Management & Technology, Bilaspur (C.G.)

Corresponding Author: uprashant888@gmail.com

DOI: 10.52984/ijomrc2404

सारांश:

वर्तमान समाज में योग शिक्षा  का अपना एक अलग महत्वपूर्ण भूमिका है साथ ही जीवन की आर्थिक निर्भरता प्रदान करने में भी सहायक सिद्ध हो रही है। सामाजिक समृद्धि एवं प्रतिष्ठा की बात भी समाहित है। वर्तमान जीवन शैली में जीवन को समग्र रूप से विकसित करने की विद्या योग में विद्यमान है। अध्यापक का वास्तविक दायित्व एवं जिम्मेदारी इतनी है कि वह कितने छात्रों के प्रति सजग एवं सतर्क है। इसलिए आज की योग शिक्षा एकांगी हो गई है। इसका कारण है कि शिक्षा  का व्यवसायीकरण। योगद्या जीवन के सर्वांगीण विकास भी करती है। वह विकास की तकनीकी बनाती है। इससे पता चलता है कि जीवन को कैसे जीया जाए। बाहरी दूनिया में आत्मनिर्भरता एवं स्वस्थ रहने की कला योग शिक्षा  के द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है। परन्तु अपने आन्तरिक जगत में व्यवहार पक्ष की महत्ता है तो स्वंय के अंदर सही सोच, पवित्र भाव एवं उतकृष्ट चिंतन की आवश्यकता  सर्वोंपरि है। दोनों का मिला जुला स्वरूप योगविद्या के द्वारा ही प्राप्त होता हैं। योग विद्या दोनों को एक साथ विकसित करती हैं। आज की शिक्षा  में इन मूलभूत बातों का कोई महत्व नजर नहीं आता है। प्राचीनकाल में योग शिक्षा व विद्या ज्ञान दान की पुण्य परम्परा थी। ऋषि मुनियों और आचार्यों ने जो अपने जीवन में अनेक गूढ तत्वों का ज्ञान प्राप्त किया करते थे और अनेक समस्यों की समझ भी रखते थे। वे केवल निस्वार्थ भाव से ज्ञान की गुरू शिष्य  परम्परा हमारी वैदिक योग शिक्षा  पद्धति की देन है। जिसके मूल में योगविद्या का आधार रहा हैं।